सोमवार, 1 जून 2020

स्वदेशी गीत


कलिया सुमन सुगंधों वाला


कलिया सुमन, सुगंधों वाला, यह उद्यान स्वदेशी हो
हर क्यारी, हर खेत स्वदेशी, हर खलिहान स्वदेशी हो ।।

तन-मन-धन की, जन-जीवन की, प्रिय पहचान स्वदेशी हो
मान स्वदेशी आन स्वदेशी, अपनी शान स्वदेशी हो
वीर शहीदों के सपनों का, हर अभिमान स्वदेशी हो
ऐड़ी से चोटी तक सारा, हिंदुस्तान स्वदेशी ।।

भारत माता के मंदिर में, बहुत प्रदूषण बढ़ा दिया
लोकतंत्र को अनर्थ बनाकर, स्वदेशी को भुला दिया
समझौते की बात यहां पर, होती है हत्यारों से
भारत की कुछ गलियां गूंजे, परदेसी जयकारों से
बलिदानों की इस धरती पर, माँ का गाना स्वदेशी हो
ऐड़ी से चोटी तक सारा, हिंदुस्तान स्वदेशी हो ।।

सोने वालो सोना छोड़ो, उठो जगो अब लोहा लो
आज विदेशों के कब्जे से, वतन का कोना-कोना लो
उन्नतियों के इन गीतों का, हर सोपान स्वदेशी हो
ऐड़ी से चोटी तक सारा, हिंदुस्तान स्वदेशी हो ।।

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विजय तो न्याय की ही होगी

विजय तो न्याय की ही होगी, सदा अन्याय हारा है ।
सत्य आधार है शक्ति, सदा पापी को मारा है ।।

चले छल छद्म के पाशे
युधिष्ठर पल को हारे भी ।
अंह में डूब दुःशासन
सती के वस्त्र फाड़े भी ।
परंतु एक सीमा तक चला, है पाप का नाटक ।
सदा श्रीकृष्ण ने युग कँस, रण में क्यों संहारा है ।।1।।

अंधेरी रात जब आती
नहीं होगी सुबह लगता ।
विकट आतंक है भारी
मनों में भाव भय जगता ।
परंतु चंद घड़ियों की कहानी घन अंधेरा है ।
सदा आलोक ने डटकर, अंधेरे को हटाया है ।।2।।

डब्ल्यू.टी.ओ. की धारा
फंसे जो देशों को मारा ।
कृषक मजदूर संवारा
मैक्सिको में तभी हारा ।
पश्चिमी देशों के मन की, खुल गई पोल अब उनकी ।
जुट गये देश सब साथी, यही भारत सहारा है ।।3।।

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बने राष्ट्र का धर्म स्वदेशी


बने राष्ट्र का धर्म स्वदेशी, वैभव मंत्र स्वदेशी ।
स्वतंत्रता का प्राण स्वदेशी, हो युग धर्म स्वदेशी ।।

भारत की वत्सल गोदी में, पोषित राष्ट्र हमारा ।
मातृभूमि के रस से सिंचित, तन-मन जीवन सारा ।
भारत माता गौरव के हित, ले संकल्प स्वदेशी ।।1।।
हो युग धर्म स्वदेशी........

भूल गए क्या धर्म है अपना, विस्मृत चिंतन धारा ।
शक्ति-पुंज यह देश हमारा, अपमानित क्यों हारा ।
दुःख दास्य को दूर हटाने, संबल श्रेष्ठ स्वदेशी ।।2।।
हो युग धर्म स्वदेशी........

आर्थिक आजादी को खतरा, विदेशियों का डेरा ।
चारों और विषमता छाए, छा जाए अंधेरा ।
प्रभात बेला हो रही है, चमके सूर्य स्वदेशी ।।3।।
हो युग धर्म स्वदेशी........

ग्राम नगर क्या घर घर में हो, जय जय स्वदेशी नारा ।
दसों दिशा में हो सुख-शांति, लेकर यही सहारा ।
शोषित दुनिया मुक्त बने जो, गूंजे गान स्वदेशी ।।4।।
हो युग धर्म स्वदेशी........

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स्वदेशी जीवन दर्शन फिर से


स्वदेशी जीवन दर्शन फिर से, जन जन जो अपनाता है ।
कर्म पंथ पर चले आज तो, निर्भय गान सुनाता है ।।

 जाति प्रांत और वर्ग भेद के, भ्रम को दूर भगाना है ।
भूख, बीमारी और बेकारी, इनको आज मिटाना है ।
स्वदेशी भाव जगाए मन में, सबकी भारत माता है ।।1।।

आज विदेशी आ रहे हैं, मुद्रा लेकर जाते हैं ।
विदेशी ऋण का जाल बिछाकर, उसमें हमें फँसाते हैं ।
पेटन्ट का आधार लिया है, कानून बदला जाता है ।।2।।

राष्ट्र हमारा जाग उठा है, शत्रु को पहचानेंगे ।
चुन चुन कर हम लोहा लेंगे, डटकर मार भगायेंगे ।
चला रहा अभियान जागरण, संदेश यह पहुंचाता है ।।3।।

हमें किसी से बैर नहीं है, हमें किसी से भीति नहीं।
सबसे मिलकर काम करेंगे, संगठना की रीति यही।
पूरा विश्व एकात्म बनाये, सृष्टि प्रलय तक नाता है ।।4।।

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समर्थ भारत के इस रथ के


समर्थ भारत के इस रथ के, उद्यमी हम सारथी
भारत मां की तन मन धन से, चलो करें हम आरती ।।ध्रु.।।

गुणवत्ता का मर्म समझ ले, उत्पादन को करे समन्वित
मानदण्ड उत्पादकता के, उपभोगों को करें संयमित
खनिज, द्रव्य, जल वायु देकर, मां भारती उपकारती ।।1।।

श्रमिक उद्यमी और खेतिहर, ग्राम-नगर बन के वासी
सभी सुखी हों सभी निरामय, परिवार बनें जग के वासी
हर हाथ को दे जो काम वही, तंत्र यही अपनी नीति ।।2।।

स्पर्धा से दुनियाभर की, नहीं कभी मुख मोड़ा हमने
मूल्यहीन हिंसक स्पर्धा को, पछाड़ने की ठानी हमने
उत्पादन श्रम गुण प्रतिभा में, बने श्रेष्ठ हम भारती ।।3।।

पर्यावरण और प्रकृति दोहन, विकसन की यह नीति शाश्वत
निर्मित धन और बाजारों को, आज करें हम पुनः विकेंद्रित
ग्राम आधारित उद्योगों से, सुजल सफल हो भारती ।।4।।

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स्वदेश भाव फिर जगे


स्वदेश भाव फिर जगे, स्वदेश की पुकार है।
अस्मिता पर देश के, विदेश का प्रहार है ।।ध्रुव।।

देश देश लूट कर जो बने महान हैं
आई.एम.एफ. गेट वर्ल्ड बैंक के निधान है
झोंकते हैं धूल, झूठ का गरम बाजार है ।।1।।

कुटुंब है वसुंधरा, हम धरा के पूत है
समग्रता, एकात्मता की, संस्कृति के दूत हैं
सत्यपान का हमें, मिला सुसंस्कार है ।।2।।

कुटुंबभाव तोड़कर, जो रच रहे बाजार है
धर्मभाव छोड़कर, जगा रहे विकार है
आक्रमण जो कर रहा, वह शत्रु धुवाँधार है ।।3।।

उठो जगो उखाड़ दो, विज्ञापनों के जाल को
जवाब दो खरा खरा, विदेशियों के माल को
हिन्द देश में सुनो, उठा प्रचंड ज्वार है ।।4।।
स्वदेश भाव फिर जगे................

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हर हाथ को हो काम 


हर हाथ को हो काम, हर खेत को पानी।
जगभर में फिर गूंजेगी, भारत की अमर कहानी ।।ध्रुव।।

जो देश बड़े कहलाते
माया का जाल बिछाते।
निज स्वार्थ सुरक्षा खातिर
आर्थिक बंधन बंधवाते।
इन षड़यंत्रों को जान
हम ध्वंस करे मनमानी ।।1।।
जगभर में................... 

हर घर का मिटे अंधेरा
शिक्षा के दीप जलाये।
अपने पैरों पर अपने
उद्योग कर्म पनपाये।
भावना स्वदेशी आज
हमने मन में है ठानी ।।2।।
जगभर में................... 

हम आज नहीं युग-युग से
मानव का धर्म निभाते।
नर में नारायण देखा
जड़ में भी चेतन पाते।
अपना अतीत पहचान
हम बने राष्ट्र अभिमानी ।।3।।
जगभर में...................

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स्वदेशी के व्रत के गाने 


भारत माँ का मान बढ़ाने बढ़ते माँ के मस्ताने
कदम-कदम पर गाते जाते, स्वदेशी के व्रत के गाने ।।ध्रुव।।

कला शास्त्र विज्ञान क्षेत्र में, भारत जैसा कोई न था
धुवाँ निकलता सोने का और, समृद्धि का सानी न था
बिसर गये जब भाव स्वदेशी, खोया तब वैभव हमने ।।1।।

क्षेपणास्त्र और क्रायो इंजिन, परम संगणक बना दिया
सूचना तकनीकी ने भी, जग में सिक्का जमा दिया
प्रतिभा अपनी काज विदेशी, फिर भी उसे अँजाने ।।2।।

आओ हम सब मिल अपनाये, स्वदेशी जीवनधारा को
विदेशीयत को मार भगायें, कर जागृत पुरुषार्थ को
सबजन हित की जीवनशैली, दुनियाभर को सिखलाने ।।3।।

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पूर्ण विजय संकल्प हमारा


पूर्ण विजय संकल्प हमारा, अनथक अविरत साधना।
निशिदिन प्रतिपल चलती आई, राष्ट्र धर्म आराधना।
वंदे मातृभूमि वंदे, वंदे जगजननी वंदे ।।ध्रुव।।

पुण्य पुरातन देश हमारा, मानवता आदर्श रहा
संस्कृति का पावन मंगल र व, कोटि कंठ से नित्य बहा
सकल विश्व का मंगल करने, सर्वस्वार्पण प्रेरणा ।।1।।

स्वदेशी के संबल से अपना, देश बनेगा श्रेष्ठ महान
अतीत की गौरव गाथा का, पथ दर्शक प्रेरक आव्हान
भविष्य का पथ उज्जवल करने, शक्ति संचयन साधना ।।2।।

मातृभूमि आराध्य हमारी, राष्ट्रभक्ति है प्रेरणा
ईश्वर का है कार्य स्वदेशी, जीवन की संकल्पना
स्वाभिमान के स्वदेशी पथ पर, चरैवेति की कामना ।।3।।

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-ः देश उठेगा :-


देश उठेगा अपने पैरो, निज गौरव के भान से ।
स्नेहा भरा विश्वास जगाकर, जीयें सुख सम्मान से ।।
                                         देश उठेगा.......... 

परावलंबी देश जगत में, कभी न यश पा सकता है ।
मृग तृष्णा में मत भटको, छीना सब कुछ जा सकता है ।।
मायावी संसार चक्र में, कदम बढ़ाओ ध्यान से ।
अपने साधन नहीं बढ़ेंगे, औरों के गुणगान से...................।।1।।

इसी देश में आदिकाल से, अन्न रत्न भंडार रहा ।
सारे जग को दृष्टि देता, परम ज्ञान आगार रहा ।।
आलोकित अपने वैभव से, अपने ही विज्ञान से ।
विविध विधाएं फैली भू पर, अपने हिन्दुस्थान से...................।।2।।


आज देश की प्रज्ञा भटकी, अपनों से हम टूट रहे ।
क्षुद्र भावना स्वार्थ जगा है, श्रेष्ठ तत्व सब छूट रहे ।।
धारा ‘स्व’ की पुष्ट करेंगे, समरस अमृत पान से ।
कर संकल्प गरज कर बोले, भारत स्वाभिमान से...................।।3।।


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